Raja Mansingh और क्षत्रिय विरोधियों का दोगलेपन

मान सिंह ,तुर्क के साथ थे तो उन्हें गाली दी जाती है । बिहार ,बंगाल और उड़ीसा में अफगानों की हुकूमत थी जिसे मान सिंह ने खत्म किया और वहां हिन्दू जमींदारों को संरक्षित किया और उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर को भी खुर्दा के हिन्दू राजा को सौंप दिया ।ऐसा ना होता तो आज जितनी आबादी मुसलमानों की वहां है उससे दो गुनी आबादी होती ।शायद पूरा का पूरा बंगाल ही बांग्लादेश हो चुका होता ।
फिर भी मान सिंह को गाली मिलती है और वो काफी हद्द तक ठीक भी है ।
पर तुर्क और अफ़ग़ान को दूध कौन बेचता था ,अनाज कौन बेचता था ,उनके तलवार कौन बनाता था ,उनको तेल कौन बेचता था ? क्या इन लोगो के तुर्क और अफ़ग़ान से जो संबंध थे उसपर कोई बात करता है ? दुश्मन यदि वो सिर्फ राजपूत के लिए थे तो खूब गाली दो मान सिंह को पर साथ में ये स्वीकार करो कि वो तुर्क ,अफ़ग़ान तुम्हारे दोस्त थे ।यदि दोस्त नहीं होते तो तुम लड़ते उनसे । लडे तुम ? नहीं लड़े तो क्यूं ? कायर थे ? यदि उनसे नहीं लड़े क्यूंकि वो तुम्हारे दोस्त थे तो मान सिंह को क्यूं गाली देते ? कोई शर्म नहीं ?

हमने तो कभी सवाल ही नहीं पूछा ।धीरे धीरे बहुत कुछ पूछेंगे ।

मैं यहां जो भी लिखता हूं वो दूसरों के लिए नहीं सिर्फ और सिर्फ राजपूतों के लिए लिखता हूं ।मेरी बात सही लगती है तो स्वीकार कीजिए यदि गलत है तो विरोध कीजिए । दूसरी जाति वालों को जो सोचना समझना है वो जाने ।हमें ना किसी के अपमान का भय है ना ही सम्मान की चाहत ।
जो जाती आपके पुरखो को चुरा अपना बाप बना रही उसका इलाज पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन है ।राजनीतिक रूप से एकजुट हो जाए ।

दूसरे क्या सोचते हैं वो छोड़ दीजिए ।आप अपनी बात रखीए ।अपने हक की बात कीजिए । जिसे दोस्त बनना होगा बनेगा जिसे दुश्मन बनना होगा वो बनेगा।

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