स्वतंत्र क्षत्रिय विचारधारा की ज़रूरत।


Pic: Chausath Yogini Temple , Kachwaha of Gwalior

कोई भी समाज एक होकर सुनियोजित तरीके से अपनी तरक्की के लिए काम तब करता है , जब उसकी एक स्वतंत्र और रचनात्मक सामाजिक राजनैतिक विचारधारा हो।

दलितों का Ambedkarite Buddhism
जाटों का किसान unionism
मराठी ब्राह्मणों मराठों का हिंदुत्व

— पंजाबी जाटों खत्रियों में सीखी एक राजनैतिक सामाजिक मूवमेंट रहा।

अहीरों ने आर्य समाज के कहने पर यादव मूवमेंट बनाया जिसमें अपने साथ कमारीया, घोशी, गोची जातियों को एक विचारधारा दी - हम सब यादव है।

बंगाली सवर्ण भद्रालोकों की विचारधारा है communism, जिसके नाम पर वे सत्ता में बने रहना चाहते हैं, और मीडिया अकेडमीया इत्यादि में दबदबा कायम रखते हैं।

इसी तरह तामील ओबिसियों की विचारधारा है dravidian मूवमेंट।

अब आप बताएं कि हम क्षत्रियों में कौनसी विचारधारा है - सामाजिक और राजनैतिक। (हमारी हर बैठक आध्यात्म की ही होती है, सामाजिक पर नहीं बोलते)

आम राजपूतों की भी गलती नहीं है - राजपूतों के पढ़े लिखे वर्ग पत्रकार बुद्धिजीवियों ने भी समाज पर ज़्यादा साहित्य लिखा नहीं नाही सामाजिक कार्य कर कोई चेतना जगाई हो - कोई भी intellectual revolution समाज के ऊपरी पढ़े लिखे तबके से आती है ।

जब राजपूतों का स्वतंत्र साहित्य ही नहीं है, और नाही कोई स्वतंत्र बुद्धिजी वर्ग, तो राजपूत ब्राह्मण बनिए खत्री के एलीट वर्ग द्वारा साहित्य फिल्मों इत्यादि से ही अपनी पहचान करता आया है । फिल्मों में पृथ्वीराज और संयोगिता की कहानी दिखाएंगे भले ही वह गलत हो, तो आम राजपूत भी वही मानेगा जब तक कोई उनका खुदका साहित्यकार इतिहासकार लिखकर बताए कि भाई संयोगिता केवल काल्पनिक है।।
आजकल, शेखावतों की नई पीढ़ी भी मानसिंह जी को गद्दार बोलते हैं क्यूंकि यही
आरएसएस के मराठी ब्राह्मणों ने लिखा है।

आज भी कितने राजपूत पत्रकार या बयोरोक्रेट ने यह लिखकर छापा हो कि " ग्रामीण कृषि प्रधान समुदाय होने के नाते राजपूतों को पढ़ी लिखी शहरी जातियों - ब्राह्मण, खत्री, बनिया, कायस्थ - के साथ रख उनके साथ सामाजिक आर्थिक राजनैतिक रूप से घोर अन्याय हुआ व हो रहा है।। किसी एलीट ने यह बात नहीं बोली या लिखी और नाही समाज को इस अन्याय के बारे में अवगत कराया है।।

वही है सर।
बीजेपी हो या कोंग्रेस सत्ता ब्राह्मण बनिए की ही है क्यूंकि दोनों तरफ यही नरेटिव-setter हैं.
तो इन लोगों को कास्ट न्यूट्रल दिखना भी पड़ता है top पर रहने के लिए। क्यूंकि नरेटिव बनाना ही इनकी सबसे बड़ी ताकत है - राजस्थान के प्रजा सभा से लेकर हाल ही के किसान आंदोलन में ब्राह्मण नेतृत्व है जबकि ब्राह्मण किसान इतने नहीं । आज भी कोम्युनिज्म के नाम पर बड़े बड़े ब्राह्मण कायस्थ जमींदारों के वंशज मीडिया , अक्डमिक और यहां तक कि राजनीति में किसान मजदूर की राजनीति का नेतृत्व ले पाते है , वह भी इसी ताकत के कारण है।राइट विंग में भी यही ताकत काम आती है।

अब इनकी देखा देखी में राजपूत भी इनकी नकल कर देते हैं। ज़्यादातर राइट विंग और कुछ सेकुलर लेफ्ट पॉलिटिक्स में भी। और राजपूत बड़े नेता भी बन जाते हैं मगर नरेटिव setter नहीं बन पाते - वीपी सिंह , चंद्रशेखर भी आसानी से हार जाते हैं top पर जाने के बाद इसी कारण – क्योंकि आपके विरूद्ध ये आसानी से नरेटिव बना सकते हैं।

अतः प्रधान मंत्री , मुख्य मंत्री बनने के बाद भी राजपूत अपने समाज के लिए कुछ नहीं कर सकता क्योंकि वह नरेटिव setter तो है नहीं। और ऊपर से कास्ट लैस राजनीति के कारण ये अपने समाज से भी दूरी बनाते हैं जिससे समाज को ढंग का नेतृत्व भी नहीं मिल पाता – इसी vacuum में करनी सेनाएं कूद पड़ती है।

दूसरी और वे समाज है जैसे जाट अहीर मराठा सिख जिनके राजनेता community centric politics पर ज़्यादा ध्यान देते हैं और उनकी ताकत कम्युनिटी की संख्याबल पर आधारित है — अतः नरेटिव ना होने के बाद भी वे किंग मेकर है, जो बात इन्हें भी पता है। इसलिए हर पार्टी इनकी floating Votes को कैप्चर करना चाहती है।
कोई ढंग का नेतृत्व ना होने के कारण, राजपूत यहां भी मात खा जाते हैं , जबकि भले ही राजपूतों की एक स्टेट में इतनी संख्याबल ना हो, वो उत्तर भारत की सबसे बड़ी जाति कही जा सकती है — यदि कोई ढंग का नेतृत्व इन्हें एक करे और सही दिशा दे।

इसके अलावा राजपूत समाज को राष्ट्रवाद, हिंदूवाद की बजाए सिविल सोसायटी के मूवमेंट में एक समाज के रूप से सक्रिय होने की आवश्यकता है – किसान आंदोलनो में तक हमारी कोई noticeable participation नहीं है।। सिविल सोसायटी मूवमेंट्स में बड़े बड़े राजपूत नेता तो हुए मगर राजपूतों को अब एक समाज के रूप में भाग लेना चाहिए, जैसे जाट और सिख लेते हैं।

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