करणी सेना (राजपूत नाम लिए) "राजपूत संगठन" नहीं है?

वैसे तो करनी सेना एक हिंदूवादी तथा आरक्षण विरोधी संगठन है इस पर कोई दो राय नहीं है, इनके पिछले क्रियाकलापों से यह सुनिश्चित होता है । वैसे आरक्षण को राजपूत समाज की मुख्य समस्या मानकर इन्होंने हमारे राजपूत समाज का अपने संगठन में अत्यधिक ध्रुवीकरण किया और हमारा समाज ध्रुवीकरित हुआ भी।

तत्पश्चात फिल्म पद्मावत के विरोध के समय यह सेना राजपूत समाज के प्रति केंद्रीकृत स्थापित हो जाती है और यही राष्ट्रीय मीडिया में प्रसारित भी होता है। हालांकि फिल्म पद्मावत क्षत्रियों की भावनाओं को आहत करती थी, जिसके बाद यह विरोध इस सेना के नेतृत्व में आंदोलन की शक्ल लेता है तथा राष्ट्रीय मीडिया में राजपूतों कि छवि उग्रवादी स्थापित कि जाती है ।
ऐतिहासिक तथ्यों और दूसरों की पारस्परिक भावनाओं से अनभिज्ञ अन्य समाज के लोगों पर ऐसे प्रसारण का क्या प्रभाव पड़ता है, शायद पाठकों को ज्ञात हो।

अतः यह राजपूत केंद्रित सामाजिक संगठन सिद्ध हो जाता है बिना किसी आकलन के की आरक्षण और हिंदुत्व के मुद्दों में सीधा हमारे समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा या उसके पश्चात भी सर्व समाज के लोग हमारा हक मारेंगे की नहीं।

हिन्दू राजपूतों के सनातन धर्म और अपने वीर पूर्वजों लगाव के कारण यह संगठन राजपूत समाज को फिर उन मुद्दों में झोंकता है जिन मुद्दों का सीधा एक राजनैतिक पार्टी से संबंध है, जी हां बीजेपी और उसका संगठन आरएसएस । ज्ञात नहीं की इस संगठन के बड़े अधिकारियों का बीजेपी की ओर झुकाव मराठी हिंदुत्व के कारण है या कोई राजनैतिक कारण है ।

चूंकि राजपूत पहचान लिए यह देश में जातिगत ऐसा संगठन है जो हमारे सामाजिक मुद्दों को छोड़ उन मुद्दों पर अधिक बल देता है जिसमें हमारे समाज का हित ही नहीं है , बल्कि अन्य समाजों जैसे बनिया,खतरी,ब्राह्मण,गुर्जर,जाट,कायस्थ के सामाजिक संगठन इन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के मुद्दों में अनुपस्थित रहते हैं चाहे वह Caa हो, कंगना राणावत का समर्थन हो,लव जिहाद हो या पाकिस्तान से संबंधित विरोध।



राजपूत नाम लिए यह संगठन अब मराठी हिंदुत्व प्रेरित पार्टी को समर्थित हो ही चुका है तो अब यह उनकी पार्टी विचारधारा हमारे समाज पर भी थोपते हैं इसपर कोई दो राय नहीं।

अब यह संगठन यहीं नहीं रुक रहा बल्कि आरएसएस के द्वारा किए जा रहे क्षत्रीयकरण परियोजना का समर्थन भी अब यह समर्थन करने लगा है, ऐसी सांगठनिक शक्ति का क्या लाभ जिस पर पहुंचने की आशंका मात्र हो और अपनी पहचान बेचनी पड़े?
भले ही हमारे समाज को यह राजनैतिक नेतृत्व प्रदान करे ना करे लेकिन आईडेंटिटी/पहचान पहले ही दूसरी जातियों को सौंपकर सामान्य राजपूतों की पहचान पर किस प्रकार खतरा है आगे देखिए।:point_down:

खंगार - यह क्षत्रीय नहीं है, दरअसल इनका समाज भी “आरएसएस क्षत्रीयकरण” का शिकार है। फिर भी हाल ही में खेत सिंह खंगार की जयंती के वक्त कुछ करणी सेना के सदस्य इन्हें भदौरिया राजपूतों से जोड़कर प्रचारित कर रहे थे। खंगार समाज के कुछ लोग करणी सेना के पदों पर भी हैं। फिर यही खंगार “परिहार” राजपूत वंश का नाम भी उपयोग करते हैं और खुद को चंद्रवंशी प्रचारित करते हैं जबकि भदौरिया और परिहार सूर्यवंशी हैं।

खेत सिंह खंगार की भूमिका को आगामी पृथ्वीराज फिल्म में शामिल करने के लिए अनुरोध करने वाले पूर्व डाकू मलखान खंगार समाज के ही हैं।

अतः एक जाति के क्षत्रीयकरण से एक से अधिक वंश के राजपूतों कि पहचान पर खतरा बनती जा रही है, अन्य समाज का व्यक्ति इन्हें इनके उपनाम से क्षत्रीय/राजपूत मान भी लेगा उन्हें क्या फर्क पड़ता है।

लेकिन यह क्षत्रीय समाज पर किस प्रकार प्रभाव डालती है आगे देखिए -
चूड़ासमा यदुवंश राजपूतों कि एक शाखा जिन्होंने भारतीय इतिहास में मंदिर सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व बलिदान दिए ,
हाल ही में गुजरात के राजकोट में दूसरी जाति का एक युवक एक मंदिर कि मूर्ति पर अभद्र प्रदर्शन करता है, इस युवक के उपनाम में चूड़ासमा था।

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इस घटना का वीडियो तेजी से वायरल होता है तथा एक भूतपूर्व भारतीय जन प्रचलित ट्विटर हैंडल द्वारा अपराधी कि पहचान से अनभिज्ञ होते हुए इस पर टिप्पणी की जाति है - “चूड़ासमा”, इनके पूर्वजों ने गुजरात में मंदिर की सुरक्षा के लिए अनेक बलिदान दिए और यहां उनका एक वंशज ।

बाद में युवक कि असली पहचान(दलित,अंबेडकरवादी) होने की पुष्टि होती है।

अतः दूसरी जातियों द्वारा किया गया यह सरनेम अडॉप्शन राजपूतों और राजपूतों के इतिहास को कभी भी कटघरे में भी खड़ा कर सकता है।

एक करणी सेना के सदस्य भी कह रहे थे कि अन्य समाज के व्यक्ति भी करनी सेना के कार्यक्रमों में उपस्थित रहते हैं।

मान लेते हैं वे अपने समाज को लेकर संगठन के समर्थन में उपस्थित होते हैं जो कि उचित है (परंतु बाहर यही राजपूत सरनेम अडॉप्ट करें तो यह तो राजपूतों कि आईडेंटिटी पर तो खतरा है ही और आपके संगठन द्वारा स्वीकार्यता)
इसका उदाहरण कोली समाज है :point_down:

कोली - यह भी क्षत्रीय नहीं हैं लेकिन गुजरात से लेकर उत्तराखंड तक इनका भी छद्म क्षत्रीयकरण किया जा रहा है और इनके लोग करणी सेना के कार्यक्रम में उपस्थित रहते ही हैं और यह मान्यता प्रदान करने जैसा है।
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लोधी - यह भी क्षत्रीय नहीं है लेकिन कुछ समय पहले से
“सिंह राजपूत” सरनेम उपयोग कर रहे हैं। ये भी “राजपूत” सरनेम रख करणी सेना से जुड़े हों क्या पता ? वैसे प्रश्न इन जातियों का क्षत्रीय सरनेम रख करणी सेना में जुड़ने का है।

किरर - मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज की पत्नी साधना किरर क्षत्रीय महासभा की कार्यकारी अध्यक्ष हैं । क्षत्रीय पहचान पर इससे हमारे समाज को खतरा तो है ही और साथ ही चौहान सरनेम भी अडॉप्ट कर लिया वो अलग । करणी सेना तथा इनके सहयोगी संगठनों का बीजेपी और आरएसएस की ओर झुकाव इसकी स्वीकार्यता तो दे ही रहा है।

कुर्मी - छत्तीसगढ़ के मुख्मंत्री भूपेश भी कुर्मी क्षत्रीय महासभा के कार्यक्रमों में उपस्थित रह चुके हैं।
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ये जातियां केवल अपने-अपने ऐतिहासिक चरित्रों की मूर्तियां स्थापित करते व जयंतियां मनाते हैं। उदाहरण के लिए दमोह - जबलपुर - सतना ट्रैक्ट में लोधी समाज ने अपने बहुल इलाकों में अवंतीबाई लोधी की कई मूर्तियां स्थापित भी करवा दी हैं ,
जबकि कल्चुरी ,बघेल ,बुंदेला राजपूतों के शासित क्षेत्र रहे इसी क्षेत्र में उनकी कोई पहचान नहीं।
उधर पटेल लिखने वाले कुर्मी और तेली (राजपूत उपनामों का उपयोग करते हुए) सरदार पटेल की मूर्तियां स्थापित करने में जुट ही गए हैं।

इसकी अधिकता तो तब होगी जब ये सरनेम अडॉप्ट करने वाली जातियां आपके पूर्वजों के बनवाए गए मंदिरों और किलों में खड़े होकर सीना तान कर बोलेंगे की यह हमारे पूर्वजों ने बनवाया है (गुज्जर तो कर ही रहे हैं) और हमारे समाज के लोग अपने इतिहास से अनभिज्ञ कहीं दूर किसी नौकरी, पेशे,किसानी में व्यस्त रहेंगे क्योंकि हमारे संगठन सामाजिक है ही नहीं और किस विचारधारा में हमारा हित है यह जानते नहीं।


तो सजग राजपूतों से अनुरोध है कि एक प्रेस कॉन्फ्रंस कर करणी सेना तथा इनके सहयोगी संगठनों से जल्द ही राजपूत समाज का नाम वापस लेकर इसे केवल हिंदूवादी संगठन घोषित करें।

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